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Saturday, June 16, 2018

fathers day -in hindi







पिता 
पितृ दिवस पर विशेष 



पिता -  जिसके साथ हमारे साहित्यकारो ने वह न्याय नहीं  किया,जिसका वहअधिकारी है।
साहित्यकारों को माँ की ममता  दृष्टिगोचर हुई ,
माँ की ममता का बखान करते हुए न तो शब्द कम  पड़े .. न कागज़  और न स्याही  ....
लिखा   ... खूब लिखा  .... और भी लिखा जा सकता है क्योकि माँ का बखान अवर्णनीय है  ...अवर्चनीय है, किन्तु पिता के प्रति कवियों और लेखकों द्वारा कृपणता दिखलाना क्या न्याय संगत है ?
क्या पिता का हदय  नहीं होता ?
क्या पिता का  ह्रदय पाषाण है ?
क्या पिता का ह्रदय अपनी संतान के लिए नहीं तड़पता ?
क्या ऊपर से कठोर दिखानेवाला पिता भीतर से भी उतना ही कठोर होता है ?
क्या उसके ह्रदय में वात्सल्य का अंकुरण प्रस्फुटित नहीं होता ?
क्यों हमारे साहित्यकारों की कलम पिता के प्रति उपेक्षित रही ?
माता कौशल्या के  स्नेह को  शब्द बना -बनाकर कर कागज़ पर खूब बहाया  ......
माता यशोदा के मातृत्व को शहद में डुबो -डुबोकर लिखा गया
लेकिन पिता दशरथ और नन्द की व्यथा पर साहित्यकारों की कलम मूक बनी रही
क्या मर्द को दर्द नहीं होता ?
होता है ,बहुत दर्द होता है उसे भी  ...अपनी संतान को दुःख और कष्ट में देखकर
पिता का ह्रदय भी भीतर से उतना स्निग्ध और कोमल होता है ,जितना एक माँ का
उसका ह्रदय भी भीतर ही भीतर अपनी संतान के लिए रोता  है ,मगर चुप-चाप  ... चुप-चाप
अंतर सिर्फ इतना है कि  माँ के आँसू दृष्टित हो जाते है और पिता के आँसू   अदृश्य रह जाते है
शमा को जलते देखकर सभी कहते है - देखो ,शमा कैसे जल रही रही है  किन्तु उसके साथ जल रहे धाँगे के प्रति किसी की सहानुभूति नहीं

पिता यथार्थ में पीता है
मगर ,मदिरा नहीं
अपनी संतान के सारे कष्ट पीता है
कष्ट की एक- दो बूँद नहीं
सारा समंदर पीता है
बच्चों के लिए जीता है
इसीलिए वह पिता है 

माँ की ममता दृश्य है  ... पिता का वात्सल्य अदृश्य
पिता भीतर से रोता  है लेकिन आँसू  दिखलाता नहीं
अपने भीतर के क्रंदन को होठों से  बाहर  नहीं आने देता
पिता अपना समस्त संचित -अर्जित सुख अपनी संतान पर न्यौछावर कर देता है
अपना सर्वस्व अपनी संतान पर लुटा स्वयं रिक्त रहता है
अपनी संतान से सुख न पाकर भी अपनी संतान को सुखी देख-देखकर खुश होता रहता है
कोई गिला नहीं कोई शिकवा नहीं कोई शिकायत नहीं

सुनाई नहीं देता किसी को उसका क्रंदन
है पाषाण लेकिन उसमें भी है स्पन्दन 
 दिल उसका भी रोता है
समंदर का पानी किनारे से बाहर नहीं आता
पिता के भीतर का आंसू भी बाहर नहीं आता
माँ से वह इक्कीस नहीं, न सही
लेकिन उन्नीस भी नहीं
वह भी बीस है
औरों के लिए न सही
अपनी संतान के लिए रईस है
जो धूप में बादल का टुकड़ा बनकर चलता है  
जो सरदी में तन संतान का ढक ठिठुरता है
जो बरसात में छाता बनके छा जाता है
इसीलिए पिता कहलाता है

धनी वर्ग में पिता का त्याग भले ही स्पष्ट नज़र न आता हो किन्तु मध्यम  और निम्न वर्ग में पिता के त्याग का आकलन आँखे देखकर ही कर लेती है -
गरीब पिता की कमीज की कॉलर घिस गयी है ,नई  कमीज चाहता है। उसी समय बच्चे को स्कूल की यूनिफार्म खरीदनी हो तो पहले बच्चे की यूनिफार्म खरीदता है।
गरीब पिता के जूतों के तले घिस गए ,नया जूता खरीदना चाहता है,उसी समय बच्चे को स्कूल  यूनिफार्म के जूते खरीदने  हो तो पहले बच्चे के  यूनिफार्म के जूते खरीदता है।
अपने से पहले बच्चे के लिए गर्म कपडे खरीदता है
खुद बारिश में भींगता रहा ,लेकिन छाता बच्चे के सिर  पर रखा
खुद गरमी में तपता रहा ,लेकिन बच्चे को छतरी देकर छाया में रखा
अपने अभाव  ...अपने दर्द   ..... अपनी परेशानी को पीछे रखकर ,पहले बच्चे का ध्यान रखा

वह दर्द पीता है ,इसलिए वह पिता है 
वो नाव है ,पतवार है ,किनारा है
हर एक का सहारा है
मुसीबतों से कभी न हारा है
संतान के लिए
ईश्वर जितना ही प्यारा है
माँ का विश्वास है  ,
संतान की आस है ,
इसीलिए वह ख़ास है  

Tuesday, May 1, 2018

mazaboor nahi ,mazadoor hoon mai -hindi kavita

३१ मई ,मज़दूर दिवस पर विशेष












हिंदी कविता –
मै मज़दूर हूँ    
(सुरेश सुमन )

मज़दूर हूँ ,
लेकिन नहीं मज़बूर हूँ मै
दुनिया में रहकर भी ,
तुम्हारी दुनिया से दूर हूँ मै

न मै अपनी मरजी से गरीब हूँ
और ,न तुम अपनी मरजी से अमीर हो 
मै तो बस ,अपना नसीब हूँ

हे अमीरों ,
तुम्हारी दौलत –शौहरत से
न मुझे कोई रश्क है
न मेरी आँखों में कोई अश्क है
मुझे तो इतना सा इंसाफ चाहिए
मेरे हिस्से की ज़मीन पर
तुमने जो ईमारत बनाई है
मुझे तुम्हारा अहसान नहीं
अपने हिस्से की ज़मीन चाहिए

जो समझते है मुझे आँख का काँटा
लेकिन किसी के लिए मै
उसकी आँखों का नूर हूँ
हाथ मेरे सख्त 
लेकिन दिल से नहीं मै क्रूर हूँ

यह मेरा नसीब है
उपरवाले ने नीचे की दुनिया को
खूबसूरत बनाने के काबिल समझा है मुझे 
इसीलिए तुम्हारी तरह लखपति नहीं 
मज़दूर बनाया है मुझे 

आसमा में एक चाँद लगाया है
उपरवाले ने
चार चाँद लगाये है दुनिया में 
इस नाचीज कहलानेवाले  ने 

मेरे हिस्से में धन नहीं
पुरुषार्थ आया है
इसीलिए मैंने माथे पे
मज़दूर का तमगा लगाया है

गरीब हूँ ,
लेकिन ईश्वर के करीब हूँ
अभावों में जीता हूँ
लेकिन विधाता से
घृणा नहीं करता हूँ
प्रार्थना के लिए न सही
गालियाँ देकर तो
हर रोज याद करता हूँ   

सो रहे हो तुम जिस छत के नीचे
वह मैंने ही बनाई है
यह अलग बात है 
तुमने घरों में
और मैंने आसमा के नीचे रात बिताई है

कह रहे हो तुम जिसे मेरा पसीना
जब तक भीतर था लाल था 
बाहर आकर अपमान से हो गया पानी
और पी गया मेरी जवानी

लेखकों की कलम टूट जाएगी
कागज़ कम पड़ जायेगे
स्याही रीत जाएगी
पर मज़दूर की दास्ताँ न लिखी जाएगी
वैज्ञानिक आसमान के तारें गिन आएंगे 
मान लेता हूँ
लेकिन मज़दूर का दर्द
गिनते-गिनते कंप्यूटर थक जायेगे  
मेरी दुःख भरी कहानी पर
न कोई आँसू बहाए
न मलहम लगाये
ये ज़ख्म किसी और ने नहीं
उसने लगाये है
जिसने चाँद –सितारें  बनाये है
मज़दूर होना मेरा पाप नहीं
मज़दूर होना मेरा अभिशाप नहीं  

Tuesday, April 17, 2018

sarvpalli dr.radha krishanan -punya tithi in hindi

 सर्वपल्ली डॉ.राधा कृषणन की पुण्य तिथि पर विशेष  








निर्वाण -१७ अप्रैल , 


मैंने देश- विदेश के जितने भी महान व्यक्तित्व के धनी महा पुरुषों की जीवनियां पढ़ी और जीवनी पढ़कर जिनके मानवीय गुणों ने सर्वाधिक प्रभावित किया ,उनमे से एक है - शिक्षक से देश के सर्वोच्च पद राष्ट्रपति तक पहुंचने वाले शिक्षाविद ,दार्शनिक ,भारतीय संस्कृति के प्रबल समर्थक -संवाहक -विचारक  डॉ.राधाकृष्णन जी ,जिनकी आज पुण्य तिथि है। 
शत -शत नमन 

किसी भी मनुष्य का बाह्य व्यक्तित्व उसके आंतरिक विचारों का ही प्रतिबिंब होता है। यह कथन डॉ.राधा कृष्णन जी के  व्यक्तित्व  पर  अक्षरशः चरितार्थ होता है। राधा कृष्णन जी दर्शन शास्त्र के विद्यार्थी भी थे और शिक्षक भी। सर्वपल्ली राधा कृष्णनजी  की पहचान देश के राष्ट्रपति के रूप में चिन्हित या रेखांकित करना उनके महान व्यक्तित्व को लघुरूप में प्रस्तुत करना होगा। उनके व्यक्तित्व का मूल्यांकन उनके आध्यात्मिक एवं दार्शनिक विचारों में समाहित है। राधा कृष्णन जी ने हिन्दू धर्म ग्रंथों का गहनता से अध्ययन अन्य धर्म ग्रंथों के साथ तुलनात्मक रूप से किया। 
ईसाई मिशनरी द्वारा  भारतीय धर्म और धर्म ग्रंथों को रूढ़ ,आडम्बर ,अंध-विश्वास और अतार्किक और मिथकीय मान्यताओं से परिपूर्णहोने के रूप में प्रसारित किया जा रहा था। किसी भी राष्ट्रवादी का ह्रदय अपनी संस्कृति की आलोचना सुनकर और हेय दृष्टि से देखे जाने पर आहात होता है ,शायद इसी भावना ने राधा कृष्णन जी को भारतीय धर्म ग्रंथों का गहनता से अध्ययन करने के लिए प्रेरित किया होगा। राधा कृष्णन जी ने गूढता से अध्ययन कर यह निष्कर्ष निकाला कि  भारतीय संस्कृति सांस्कृतिक विचार-धारा और धर्म शास्त्र  चेतना युक्त है ,सत्य है और आध्यात्मिक दृष्टि से समृद्ध है ,
उनकी पुण्य तिथि  पर उनके विचारों का स्मरण करना हमारे जीवन पथ का पथ प्रदर्शन करेगा। 
आप हम अपने दैनिक जीवन में कई सारे आध्यात्मिक शब्दों का प्रयोग तो करते है किन्तु उनमे अन्तर्निहित मर्म  को नहीं जानते । राधा कृष्णन जी ने उन्ही आध्यात्मिक शब्दों को दार्शनिक दृष्टि से जाँचा -परखा ,तदुपरांत वैचारिक अभिव्यंजना की। 
नीचे  दिया गया गद्य अवतरण उनके दार्शनिक एवं आध्यात्मिक वैचारिक सिद्धान्तों की अभिव्यक्ति है। 
राधा कृष्णन जी का मनना था कि आध्यात्मिकता के मर्म को समझने के लिए समझनेवाले का ह्रदय भी पवित्र होना चाहिए। ह्रदय को निर्मल बनाकर ही आध्यात्मिक मर्म की अनुभूति की जा सकती है। 
वे कहते थे कि  मनुष्य जैसा सोचता है ,वैसा ही हो जाता है। मनुष्य की सोच से कृतित्व और  कृतित्व से व्यक्तित्व प्रतिबिंबित होता  है। 
धर्म के अभाव में मनुष्य बे-लगाम  घोड़े की तरह हो जाता है। धर्म के प्रति दृढता और विश्वास से मनुष्य भय पर विजय पा सकता है। वह भय चाहे असफलता का हो ,चाहे मृत्यु का। 
राष्ट्र और नागरिक के मध्य साम्य बतलाते हुए वे कहते थे कि  व्यक्ति और राष्ट्र का निर्माण त्याग से होता है। 
उन्होंने कहा कि  प्रेम द्वेष से शक्तिशाली होता है। 
पुस्तकों के बारे में वे कहते थे कि  पुस्तकें एकांत में विचार करने का अवसर प्रदान करती  है। पुस्तके एक सेतु है जिस पर से विभिन्न संस्कृतियों का आवागमन होता है ,तो  कला मानवीय आत्मा की गहरी परतों को उजागर करती   है।  
शिक्षा  का उद्देश्य बतलाते हुए उन्होंने कहा था कि  शिक्षा का उद्देश्य मानव की आतंरिक रचनात्मक प्रवृतियों को इस सीमा तक विकसित एवं सक्षम बनाना होना चाहिए जो प्राकृतिक आपदाओं और परिस्तिथियों से लड़ना सीखा सकें।मानव मस्तिष्क का अधिकतम उपयोग शिक्षा के द्वारा ही किया जा सकता है।वसुधैव कुटुम्बकम की भाँति ही समूचा विश्व एक पाठशाला है।   शिक्षा का स्वरुप वैश्विक होना चाहिए ,वैश्विक शांति की स्थापना विश्व की पहली और अनिवार्य आवश्यकता है।   मानव यदि दानव बन जाये तो यह मानव की हार है और यदि मानव ,महामानव बन जाये तो ये  उसका चमत्कार होगा और यदि मानव ,मानव बन सका तो तो ये उसकी जीत है। 
यदि मनुष्य को आत्मज्ञान हो जाए तो आत्मज्ञान मनुष्य की अन्तर्निहित बुराइयों को नष्ट कर देगा। ज्ञान मनुष्य को पूर्णता की शांति प्रदान करता है जबकि प्रेम परिपूर्णता प्रदान करता है। धन ,शक्ति ,दक्षता ये मानव जीवन को भौतिक सुख दे सकने की साधन तो बन  सकते है किन्तु जीवन को परिपूर्ण नहीं बना सकते।जानकारी के ढेर को  ज्ञान नहीं कहा जा सकता ,ज्ञान वह है जो भीतर के अंधकार को मिटाकर सत्य से साक्षात्कार कराए।  आत्मशांति किसी अन्य कारण से नहीं बल्कि स्वयं के स्वभाव में परिवर्तन करके प्राप्त की जा सकती है।   यदि मनुष्य जीवन को बुराई  और संसार को भ्रम मनाता है तो यह मनुष्य की कृतघ्नता होगी। 

मनुष्य का जीवन भले अल्पकालिक हो किन्तु उसमे अनन्त खुशियां समाहित है। सुख- दुःख जीवन की अनिवार्यता  है ,इसे समभाव  से स्वीकार किया जाना चाहिए। मृत्यु प्रामाणिक सत्य है ,यह धनी  -निर्धन का भेद किये बिना सभी को समान रूप से ग्रसित करती  है।धनी  वर्ग के अहंकार व् असंतोषपूर्ण जीवन की तुलना में शांत मस्तिष्क वाला संतोष और सादगीपूर्ण जीवन कहीं ज्यादा श्रेष्ठ है। 
विनोदप्रियता भी उनके व्यक्तित्व का एक खास गुण था -एक किस्सा याद आता है उनकी विनोदप्रियता और वाक्पटुता का -एक समारोह में जिसमे कुछ अंग्रेज भी सम्मिलित  थे। वे अंग्रेज महोदय अपनी गोरी चमड़ी की प्रसंशा करते हुए कह रहे थे कि ईश्वर ने उन्हें अन्य जातियों की तुलना में विशेष सुन्दर बनाया है। यह सुनकर समीप खड़े राघकृष्णाजी ने तुरंत एक काल्पनिक घटना बनाकर कहा कि  सृष्टि प्रारम्भ में ईश्वर ने रोटी बनाई ,रोटी कच्ची रह गयी। वह कच्ची रोटी जिस जाति  को खिलाई वह गोरी चमड़ी वाली हो गई। ईश्वर ने दूसरी रोटी बनाई। रोटी पहले की तरह कच्ची न रह जाये ,इस प्रयास में रोटी कुछ ज्यादा सिक गई और काली पड  गयी ,जिस जाति  को वह रोटी खिलाई ,वह जाति काली चमड़ी वाली हो गई। ईश्वर ने फिर रोटी बनाई और ध्यान रखा कि रोटी न कच्ची रहे और न जलकर काली पड़े। यह रोटी  न कच्ची रही और न काली पड़ी। यह रोटी ईश्वर  जाति  को खिलाई ,वे न तो कच्ची रोटी की तरह गोर हुए और न जली रोटी की तरह।  हम भारतीय उसी जाति के है न बहुत अधिक गोर और बहुत अधिक काले। 
इस तरह राधाकृष्णनजी ने उन अंग्रेज महोगय को निरुत्तर कर दिया।   

पारिवारिक पृष्ठभूमि 
नाम -          राधा कृष्णन ( सर्वपल्ली पुरखों के गाँव  का नाम )
जन्म -          ५ सितम्बर १९८८
जन्म-स्थान -तिरुत्तनि
             
पिता -            वीरा स्वामी
 माता -            सीताम्मा                                                      
प्रारंभिक शिक्षा -लुथर्न मिशन स्कूल ,तिरुपति


विवाह               १९०३ में ,१६ वर्ष की आयु में
पत्नी                 सिवाकामू
 बी.ए                     १९०० -१९०४ ,वेल्लूर कला संकाय प्रथम श्रेणी


एम  . ए            मद्रास   क्रिश्चियन कॉलेज (दर्शन शास्त्र )
अध्यापन -सेवा कार्य 
मद्रास प्रेसिडेन्ट कॉलेज में दर्शन शास्त्र का अध्यापन 
मनो विज्ञानं के आवश्यक तत्व पुस्तक का प्रकाशन 
आन्ध्र  विश्व विद्यालय के वाईस चांसलर 
मैसूर विश्वविद्यालय में दर्शन-शास्त्र के प्राध्यापक 
ऑक्सफ़ोर्ड यूनिवर्सिटी में प्राध्यापक 
 जार्ज पंचम कॉलेज में प्रोफ़ेसर
 काशी हिन्दू विश्व विद्यालय में चांसलर
दिल्ली  विश्व विद्यालय के  चांसलर

राजकीय सेवा 
 यूनेस्को में भारत का प्रतिनिधित्व 
 संविधान निर्मात्री सभा के सदस्य 
सोवियत संघ के लिए भारत की ओर से  राजनयिक 
उप राष्ट्र-पति   चुने गए (१९५२ )
राष्ट्र-पति चुने गए (१९६२ )

सम्मान 
ब्रिटिश सरकार द्वारा सर की उपाधि (बाद में लौटा  दी गई )
भारत रत्न (१९५४ )


निर्वाण -१७ अप्रैल ,१९७५ 

Monday, April 16, 2018

charlie chaplin in hindi




१६ अप्रैल 
चार्ली चैप्लिन के जन्म दिवस पर विशेष 

















हैवान रुलाता है 

इंसान हँसाता है 
 चार्ली ऐसे इंसान थे जिन्होंने दुनिया को सिखाया कि दुखों के बीच हँसा  जा सकता है।
 हिंदी  कवि हरि वंश राय बच्चन की कविता आत्म परिचय और चार्ली के व्यक्तिगत जीवन बहुत कुछ साम्य है। बच्चनजी की कविता पर एक बार दृष्टि डालते है -

मै जग जीवन का भार लिए फिरता हूँ  
फिर भी जीवन में प्यार लिए  फिरता हूँ 

मै  निज उर  के उद्गार लिए फिरता हूँ 
मै  निज उर के उपहार लिए फिरता हूँ 

मै  जला ह्रदय में अग्नि ,दहा करता हूं 
सुख दुःख दोनों में मग्न रहा करता हूँ 
है यह अपूर्ण संसार न मुझको भाता 
मै  स्वपनों का संसार लिए फिरता हूँ 

मै यौवन का उन्माद लिए फिरता हूँ 
उन्मादों में अवसाद लिए फिरता हूँ 
जो मुझको बाहर हंसा रुलाती भीतर 


कर यत्न मिटे सब ,सत्य किसी ने  जाना ?

मै  निज रोदन में राग लिए फिरता हूँ 
शीतल वाणी में आग लिए फिरता हूँ 


मै  दीवानों का वेश लिए  फिरता हूँ 
मै  मादकता नि :शेष लिए फिरता हूँ 
जिसको सुनकर जग झूम ,झुके ,लहराए 
मै  मस्ती का सन्देश लिए फिरता हूँ 

बहुत साम्य है बच्चनजी की आत्म परिचय कविता में और चार्ली के व्यक्तिगत जीवन में। 


वैश्विक सिने आकाश का वह देदीप्यमान नक्षत्र जिसकी चमक आज भी ज्यों  की त्यों ब नी हुई है ,जैसी कल  तक हुआ करती थी। क्रूर काल भी जिसकी शोहरत को गुमनामी के अँधेरे में नहीं धकेल पाया। आज  भी नई पीढ़ी के युवा और बच्चे चार्ली के नाम से वैसे ही परिचित है ,जैसे आज के किसी चर्चित फिल्म स्टार के नाम से परिचित है। 

वैसे तो चार्ली की कर्मभूमि इंग्लैंड रही ,किन्तु  लोकप्रियता विश्व के कोने-कोने तक फैली ।विश्व का शायद ही कोई ऐसा सिने दर्शक हो जो चार्ली की गुदगुदाने वाली हंसी से  परिचित न हो। 
चार्ली एक फ़िल्मकार और हास्य कलाकार से ज्यादा एक दार्शनिक  थे। ज़िन्दगी के दर्द को जितनी नज़दीकी  से देखा और अनुभव किया ,वही अनुभव उनकी फिल्मों और उनके चरित्र में स्पष्ट देखा जा सकता है। 
हरिवंश राय  बच्चन की पंक्ति उन पर अक्षरश चरितार्थ होती है -

चार्ली ने फिल्मों में स्वयं को जिस रूप में प्रस्तुत किया  ,वह एक प्रकार से उनके अतीत को ही उद्घाटित करता है। किन्तु रो-रोकर आँसूं  बहाकर नहीं बल्कि हास्य के माध्यम से। भीतर से खुद रोकर बाहर से दूसरों को हँसाना किसी सामान्य मनुष्य के वश की बात नहीं। बचपन में ही  पिता का साया छीन जाना  .... माँ का पागल हो जाना ..गरीबी..  खेलने-कूदने की उम्र में  ज़िम्मेदारी आ जाना  ...अमीरो के यहाँ नौकरी करना .. दुत्कार सहन करना घृणा और अपमान का जीवन 
दर्द को हास्य में कैसे प्रस्तुत किया जा सकता है ,चार्ली के अतिरिक्त विश्व का शायद ही अन्य कोई कलाकार इतने स्वाभाविक ढंग से प्रस्तुत कर सके। 

यह कहना गलत नहीं होगा कि  चार्ली आम आदमी का और चार्ली की फिल्मे मानव समाज को उसका वास्तविक रूप दिखानेवाला आइना थी। 
चार्ली का बचपन जिस तरह अभावों में ,गरीबी में ,धनि वर्ग के अपमान को सहते हुए बिता इन विपरीत परिस्तिथियों ने चार्ली को पीछे नहीं धकेला ,बल्कि चार्ली की ताक़त बना। चार्ली न्र फर्श से उठाकर दौलत और शौहरत के अर्श पर पहुँच कर साबित कर दिया कि  विपरीत स्तिथियाँ जीवन की सफलता में बाधक नहीं बन सकती यदि इरादों में मज़बूती हो। .. चुनौतियों का सामना करने का साहस हो  .... हताश -निराश होकर बैठने की अपेक्षा स्तिथियों को अपने अनुकूल बनाने की ज़िद हो। मनुष्य अपनी सकारात्मक सोच  ... अदम्य साहस और संघर्षों से सफलता के आसमान को छू  सकता है। चार्ली की फिल्मों का यदि आकलन करें तो पाएंगे कि  चार्ली की फिल्में कल्पना के आकाश पर नहीं बल्कि यथार्थ के धरातल को छूती हुई चलती थी। न सिर्फ फिल्में बल्कि उनका अपना व्यक्तित्व आम आदमी के दुःख और तकलीफ को ही उजागर करता जान पड़ता है। चार्ली की फिल्मे किसी वर्ग विशेष का प्रतिनिधित्व नहीं कराती देश की व्यवस्था और समाज की विसंगति पर प्रहार करती है। इतने असरदार ढंग से प्रहार करती है कि  भ्रष्ट  नेता और शोषण करनेवाले धनिक तिलमिला उठाते है। उन्हें ऐसा लगता था कि  चार्ली नाम का यह कलाकार समाज के सामने उन्हें विवस्त्र कर देगा। 
चार्ली की एक ओर   विशेषता जो प्रबुध्द वेगवेरग को प्रभावित  कराती है ,वह यह कि  चार्ली ने कला को परंपरागत सिद्धांतों में नहीं बाँधा और न व्यावसायिक फार्मूलों पर अवलम्बित होने दिया । उनकी लगभग सभी फिल्मे व्यावसायिक फार्मूलों से पृथक होकर भी दर्शकों द्वारा न सिर्फ स्वीकारी गयी बल्कि उन्हें आलोचकों द्वारा   सराहा भी गया। 
चार्ली ने अपनी फिल्मों से प्रमाणित कर दिया कि  कला का न कोई धर्म होता है और न कोई भाषा। कला सार्वभौमिक होती है। वह किसी एक देश या संस्कृति  की धरोहर  नहीं होती। हर देश के हर वर्ग के दर्शक ने चार्ली और उनकी फिल्मों को वैसे ही स्वीकार किया ,मान-सम्मान दिया सर-आँखों पर बिठाया जैसे अपने देश की कला और कलाकार को बिठाते है। 
  
 उसकी फिल्मों का उद्देश्य ही हँसाना हुआ करता था ,जिसने अपने आप को नायक से ज्यादा विदूषक के रूप में प्रस्तुत किया। सामान्य फिल्मों के नायक की तरह handsome -smart -bravo नहीं बल्कि बुद्धू रूप में प्रस्तुत किया ,सिर्फ इसलिए कि  वह दूसरों को हँसा सकें। चार्ली ने जीवन दर्शन को बहुत नज़दीकी से जाना और समझा  था।
हर आदमी अपनेआप में नायक भी है तो विदूषक भी है। दुनिया का  हर आदमी two -in -one है .सच तो यह कि  हम सब भी अपनी -अपनी  real  life  में  चार्ली  ही है।। सब में भी चार्ली की तरह नायक और विदूषक के गुण सम्मिश्रित है। चार्ली का अतीत दुःख ,अभाव ,संघर्ष और अपमान से भरा हुआ था ,फिर भी चार्ली ने  हास्य को ही चुना  ,क्योकि चार्ली यही मानते  थे कि सबके जीवन में कोई न कोई त्रासदी है ,हर आदमी भीतर से दुखी है ,यदि हम किसी को हँसा सके ,किसी के चहरे पर हँसी ला सकें ,तो यह किसी पुण्य से कम नहीं।

चार्ली अतुल्य है .. चार्ली अनुपम है और शायद रहेगा 

Tuesday, April 10, 2018

mahatma jyoti baa fule-dalit uddhar ke praneta




ज्योति बा फुले के जन्म दिवस पर विशेष 

११ अप्रैल ,१८२७




















स्वतंत्रता पूर्व का भारत -गुलाम भारत। प्रत्येक भारतीय गुलाम था-अंग्रेजों का गुलाम।  यही वह समय था ,जब भारतीय समाज का एक वर्ग ,जिसे दलित कहा जाता था ,वह अपने ही देश में अपने ही लोगों का गुलाम बना हुआ था। एक ओर  वह एक ओर राजनीतिक गुलामी  की त्रासदी भुगत रहा था ,वही दूसरी ओर सामाजिक गुलामी की बेडियों में जकड़ा हुआ कसमसा रहा था ...बेबस   .... असहाय  । इस वर्ग के भीतर अंग्रेजों की गुलामी से ज्यादा अपनों से ही सताए जाने  का दर्द भरा हुआ था। दलित दोहरी गुलामी सह रहा था। उस पर जुल्म ,अत्याचार और शोषण करनेवाले अंग्रेज नहीं बल्कि अपने आपको सवर्ण कहलानेवाले कट्टरवादी ब्राह्मण भारतीय ही थे ,जिनकी धर्म की आड़ लेकर बनाई गई सामाजिक व्यवस्था के  कारण दलित वर्ग पाशविक जीवन जीने के लिए बाध्य था ।
उन्ही सवर्ण कहलाने वालों के वंशज आज आरक्षण व्यवस्था से तिलमिला रहे है ,आरक्षण व्यवस्था के खिलाफ चीख रहे  है। आदमी चीखता तब है ,जब दर्द होता है।सरकार सुन  नहीं रही तो इन्हे गुस्सा आ रहा है।

ये दलित भी बहुत गिड़गिड़ाया था -सवर्ण के सामने ,लेकिन सवर्ण वर्ग के पूर्वजों का कलेजा नहीं पिघला। जुल्म अत्याचार की पराकाष्ठा देखिये-उस समय का दलित ,पीड़ित ,शोषित वर्ग न तो सार्वजनिक कुओं -तालाबों से पानी भर सकता था और  न  मंदिर की सीढ़ियां चढ़कर अपने भगवान की मूर्ति के दर्शन कर सकता था ,न इस दलित वर्ग के बच्चे पाठशाला में दाखिला ले सकते थे। यहाँ तक कि  कुछ जाति के लोगों को नगर के बाहर ही झोपड़ी बना कर रहना पड़ता था। इस दलित वर्ग के लिए अंग्रेजों से भी बढ़कर  सबसे बड़े दुश्मन यही सवर्ण कहलानेवाला वर्ग था।
  
जब जुल्म हद से गुजर जाता है ,तब जुल्म सहने वाला बाग़ी  हो जाता है ,आँसू  बहाने की बजाय वह शेर की तरह दहाड़ने लगता है। .वह जुल्म और अन्याय के खिलाफ उठ खड़ा होता है ...दीपक होकर भी  आँधियों को भी चुनौती देने लगता है 
 जब ब्राह्मणों की पाखण्ड की आँधी चल रही थी -महाराष्ट्र के पुणे नगर में ११ अप्रैल ,१८२७ को एक ज्योति प्रज्वलित हुई - जिसने अज्ञानता के अँधेरे को मिटाने का दुस्साहस दिखाया ,दलित को मनुष्य होकर मनुष्य की तरह जीने का भाव जाग्रत किया। जिसने शिक्षा के महत्त्व को जाना और इसी शिक्षा को शस्त्र बनाकर सामाजिक कुरीतियों की शृंखला में  जकड़ी हुई नारी  को मुक्ति दिलाने का प्रयास किया।
ज्योतिबा का जीवन प्रेरणा हैं हम सब के लिए .. यदि इरादों में मज़बूती हो तो विपरीत स्थितियों को भी अपने अनुकूल बनाया जा सकता है। स्वयं को आहूत करके ही अभीष्ट की प्राप्ति होती है। 
इतिहासकर मानते है कि  देश को कमज़ोर विदेशी आक्रमणकारियों ने बनाया किन्तु इस बात की ओर  किसी का ध्यान  नहीं गया कि देश के दलित वर्ग को राष्ट्र शक्ति का हिस्सा माना  ही नहीं गया ,उन्हें हमेशा अलग-थलग रखा गया। उन्हें मुख्य धारा  से जोड़ने की कोशिश ही नहीं की गई,इसीलिए इस वर्ग ने भी पैदा होकर जीने को विवशता मान लिया। ऐसे ही वर्ग का उद्धार करने का  ज्योति बा ने  अपने जीवन का लक्ष्य बना लिया और आजीवन इसी उद्देश्य पूर्ति  में समर्पित हो गए।

महात्मा ज्योति बा का यह कार्य साहसिक इसलिए भी कहा जायेगा क्योकि उनका यह कार्य उस समय प्रारम्भ किया  था जब ब्राह्मणवाद का वर्चस्व शिखर पर था। धार्मिक अन्धविश्वास ,जातिगत भेदभाव ,असमानता और अस्पर्शता जैसी कुरीतियां गहराई तक जड़े  जमा चुकी थी ,इस व्यवस्था के विरुद्ध आवाज़ उठाना किसी चुनौती से कम न था।
ज्योति बा जान गए थे शिक्षा के द्वारा ही सामाजिक परिवर्तन लाया जा सकता है। इसीलिए विरोधों के उपरांत भी वे स्वयं शिक्षित हुए ,अपनी अनपढ़ पत्नी को शिक्षित बनाया ,फिर दोनों ने मिलकर अशिक्षित बालिकाओं को शिक्षित करने के लिए बालिका विद्यालय की स्थापना की। स्वर्ण वर्ग द्वारा विरोध हुआ किन्तु ज्योति बा विरोध के उपरांत भी निर्भीकता के साथ अपने लक्ष्य के प्रति अडिग रहे। अपने पिता का भी विरोध सहना पड़ा। ब्राह्मणों द्वारा उनके पिता पर इतना दबाव डाला गया कि  पिता ने अपने बेटे-बहू को घर से निकल दिया।ज्योति बा ने पिता से अलग होना स्वीकार कर लिया किंतु अपने सिंद्धान्तों को अपने से अलग नहीं होने दिया।
बालिका शिक्षा का सूत्रपात ज्योति बा ने ही किया था। नारी उद्धार के लिए विधवा द्वारा केश मुंडन का विरोध और विधवाओ के पुनर्विवाह का समर्थन करना उस समय के लिए निस्संदेह एक साहसिक कार्य था।
ज्योति बा ने पृथक -पृथक सम्प्रदायों का समन्वय करने के उद्देश्य से सत्य शोधक समाज की स्थापना की ,जिसे उस समय के प्रबुद्ध वर्ग द्वारा समर्थन भी प्राप्त हुआ। ज्योति बा की बढ़ती  लोकप्रियता से कट्टरवादी ब्राह्मण भयाक्रांत हो उठे। बताया जाता है कि ज्योति बा के बढते प्रभावों को देखते हुए उनकी हत्या का षडयंत्र भी रचा गया था।
ज्योति बा ने सामाजिक वैमनस्य और विरोधाभासों का अंत करने के लिए जो वैचारिक चेतना की अलख जगाई ,उसे जीवन की अंतिम सांस तक प्रज्वलित रखा।
ज्योति को महात्मा बुद्ध और भीमराव अम्बेडकर की बीच की कड़ी कहा जा सकता है। २६ नवम्बर १८९० को ज्योति बा की जीवन ज्योति बुझ गई किन्तु उनके विचारों की अलख अब भी प्रज्वलित है। 

Thursday, March 29, 2018

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महा बाहु -वीर बली -हनुमान जयंती  पर विशेष
महा बाहु -वीर बली -हनुमान














         अतुलित बलधानम ,हेम  शैलादेहं  
        दनुज वन कृशानु नामग्रगण्यं 
        सकल गुण निधानं वाना राणादिशम 
        रघुपति प्रिय भक्तं वातजातं नमामि 

आज  संकट मोचन ..महावीर .. महाबली   बल ,बुध्दि और ज्ञान के प्रदाता हनुमानजी का जन्मोत्सव है।
आज हम यहाँपौराणिक ग्रंथों में वर्णित उन  प्रसंगों  को  विषय नहीं बनायेगे कि  हनुमानजी केसरी के पुत्र थे या पवनदेव देव के  या   भगवान शंकर के  .... उनका जन्म हरियाणा राज्य में हुआ था गुजरात राज्य में  .... उनका नाम हनुमान क्यों पड़ा  ? हनुमानजी को सिन्दूर ही क्यों लगाया जाता है ? इन्हे बजरंगी क्यों कहा जाता है ? क्या वे वास्तव में शिव के  रुद्रावतार थे ? क्या चैत्र मास की पूर्णिमा को ही उनका  जन्म  हुआ था ? यदि हनुमानजी ब्रह्मचारी थे तो वे मकरध्वज के पिता कैसे बने ? क्या हनुमानजी आज भी है ?
             हनुमानजी के सम्पूर्ण जीवन चरित के  अध्ययन से यह निर्विवादित रूप  से  प्रामाणित हो जाता है  कि  यदि  कोई  अपनी समस्त इन्द्रियों को वश में करके  मन ,वचन और कर्म से अपने आप को किसी लक्ष्य या उद्देश्य के लिए समर्पित कर दे ,तो निश्चित रूप से वह देव तुल्य पूजनीय हो जाता है ।सेवक होकर भी स्वामी बन सकता है  हनुमानजी का जीवन चरित इस तथ्य का प्रत्यक्ष प्रमाण है
           किसी का भी कुल या जन्म स्थान उसे महान नहीं बनता ,उसे महान  और पूज्य बनाते है -सद्कर्म और सदाचरण  ...हनुमानजी इसलिए पूजनीय नहीं बने कि  उनके पिता केसरी या पवनदेव या भगवान शंकर थे। ..उनकी देह वज्र के समान  थी  या कि  वे शिव के रूद्र अवतार थे  ,,,उन्हें पूजनीय बनाया  उनकी समर्पित स्वामी भक्ति ने  ,उनके अपूर्व त्याग ने ,, उनकी निरभिमानिता ने .. ..  .उनकी वीरता ने  ... उनकी  बुध्दि चातुर्यता ने  .... सेवा भावना ने   ..... उनकी सदाचारिता ने ... यही वे गुण  है, जो मानव को भी देवतुल्य पूजनीय बना देते है ..
         इन्ही गुणों के कारण हनुमानजी अपने भक्तों के प्रिय है ,इन्ही गुणों के कारण  भक्त उनके श्रध्दालु बने।
          सेवक होना  हनुमानजी की पहचान भी है। सेवक क्या होता है और सेवा कैसे की जाती है  ,अगर हमारे देश के राजनेताओ को  यह सीखना है तो हनुमान जी से बढ़कर  और कोई दूसरा उदहारण नहीं हो सकता। देश के नेताओं को अपनी गिरेबान में झांककर देखना चाहिए की जो अपने आपको सेवक कहते है ,क्या उनमे सेवक कहलाने के गुण  है ?सच्ची सेवा का अधिकार तन ,मन ,धन ,यश और भोग का त्याग करके ही प्राप्त होता है। राज नेताओं के मुख से स्वयं को सेवक कहना सच्चे सेवक की प्रतिष्ठा को कलंकित करना है।
          कोई भी जब अच्छा कार्य करता है ,अच्छा कार्य उसे ऊपर उठता है ,उसे सम्मान प्राप्त होता है  ,उसका यश फैलता है ,उसकी प्रशंसा होती ,उसकी प्रतिष्ठा में अभिवृध्दि होती,किन्तु इन सब के साथ -साथ अहंकार भी आता है और यही अहंकार मनुष्य के पतन का कारण बनता ह। कहा भी गया है -अभिमानं सुरपानं अर्थात  अहंकार सुरापान के सामान है। किन्तु हम हनुमानजी के जीवन चरित से सीख सकते है कि  यश प्राप्ति के उपरांत भी निरभिमानी कैसे रहा जा सकता है  ?
           भक्ति मार्ग पर निरभिमानी होकर ही चला जा सकता है। लंका दहन के पश्चात् जब हनुमान जी लौटकर आये तो भगवान श्री राम ने हनुमानजी की बहुत प्रशंसा की ,किन्तु अपनी प्रशंसा सुनकर भी हनुमानजी में थोड़ा भी अहंकार उत्पन्न नहीं हुआ। हनुमानजी ने इस कार्य का श्रेय स्वयं  न लेकर  बड़ी विनम्रता से कहा -सो सब तव प्रताप रघुराई ,नाथ न कछू मोरी प्रभुताई
यह है विनम्रता  .... यह है निरभिमानता ,,,क्या यह गुण  ग्राह्य नहीं है ?
                       हनुमानजी से बुध्दि चातुर्य का गुण  भी उद्धरित किया जा सकता  है क्योकि हनुमानजी चतुर शिरोमणि भी थे। अपने बुध्दि चातुर्य से उन्होंने अपने स्वामी भगवान श्री राम की विजय का मार्ग भी आसान बना दिया। युध्द में विजय के लिए रावण ने शक्ति की देवी को प्रसन्न करने के लिए यज्ञ का आयोजन किया। यदि यह यज्ञ सफल हो जाता तो रावण विजय का वरदान प्राप्त करने में सफल हो जाता किन्तु हनुमानजी ने रावण द्वारा युध्द विजय के प्रयोजन से किये जा रहे यज्ञ में मन्त्र का अर्थ परिवर्तन करवा दिया। वह मन्त्र था-
जय त्व  देवी चामुण्डे जय भूतार्ति हारिणि
जय सर्वगते देवी काल रात्रि  नमोस्तु ते
इस मन्त्र में हनुमानजी ने भूतार्ति हारिणि शब्द में की जगह   करवा लिया और  भूतार्ति हारिणि भूतार्ति कारिणि  में परिवर्तित हो गया ,इससे अर्थ - पीड़ा हरनेवाली की जगह पीड़ित करने वाली हो गया । इस प्रकार हनुमानजी ने अपने बुध्दि चातुर्य से रावण का विजय हेतु किया जानेवाला यज्ञ विफल कर दिया । इसी लिए हनुमानजी को बल के साथ बुध्दि प्रदाता भी माना गया है।
अब तो मेरे बुध्दिवादी मित्रों को समझ में आ गया होगा  कि सेवक अर्थात छोटा होकर भी महान बना सकता है। मनुष्य को  मान -सम्मान ,यश -प्रतिष्ठता कर्म से प्राप्त होती है ...अपने सद्कर्मों से वे पूजनीय बनते है ,उनकी कीर्ति सदैव गूंजती है  ... मस्तक चरण वंदना में नत  होते है  ...जय-जय कर होती है। ... हनुमानजी इसीलिए पूजनीय है  .... वंदनीय है ..  प्रात:स्मरणीय है
यह चित्र देख रहे है  आप -हनुमानजी की पूरी देह पर सिन्दूर लगा हुआ है -हनुमानजी की देह पर सिन्दूर क्यों लगाया जाता है ? इसके बारे में किवदंती प्रचलित है कि जब हनुमानजी को ज्ञात हुआ  कि  मस्तक पर सिन्दूर लगाने से स्वामी की आयु बढती है ,तो उन्होंने अपने स्वामी श्री  राम की दीर्घ आयु के लिए अपनी पूरी देह पर ही सिन्दूर लगा लिया  

सतही रूप से बात सामान्य जान पड़ती है ,किन्तु अंतर में अपने स्वामी के प्रति हित कामना निहित है। 

हम सब भी सेवक है -ईश्वर के..   पृथ्वी माता के ..  राष्ट्र के  .... माता -पिता के  ... क्या हम में  है  ऐसी  हित भावना  ? यह एक विचारणीय  .... .चिंतनीय प्रश्न है हम सब के लिए 

यह दूसरा चित्र देखिये - ह्रदय में भगवान श्री राम  और सीता दिखाई दे रहे है
प्रचलित मान्यता के आधार पर  यह माना जाता है कि एक बार माता सीता ने हनुमानजी को एक बहुमूल्य की माला दी ,जिसे हनुमानजी ने तोड़ कर फेंक दिया। सीता द्वारा कारण  पूछने पर हनुमानजी ने अपना ह्रदय चीरकर राम-सीता का चित्र दिखाते हुए कहा कि इससे अधिक मूलयवान मेरे अन्य कुछ नहीं

हनुमानजी का यह  कथन कितना गहरा अर्थ छिपाये हुए है
 जिससे हम निस्वार्थ प्रेम करते है -वह हमारे ह्रदय में बसा होता है।
ऐसा ही प्रेम हम भारतीयों में इस धरती माता के प्रति हो ,जिसके हम पर अनेकानेक उपकार है
ऐसा ही भाव राष्ट्र के प्रति हो जो हमें पहचान देता है
ऐसा ही भक्ति भाव माता-पिता के प्रति हो , जिनके  ऋण से उऋण नहीं हुआ जा सकता है

ऐसा ही प्रेम ,ऐसा ही समर्पण ,ऐसा ही भक्ति भाव हमारे ह्रदय में हो ,यही सन्देश देता है यह चित्र हम भारतीयों को 

हनुमानजी बल ,बुध्दि ,विद्या और भक्ति के प्रदाता है। हम सब उनसे बल ,बुद्धि ,विद्या और भक्ति का वरदान माँगते है  .... माँगा उसी से जाता है ,जो इन सब का स्वामी हो  ..... और हनुमानजी इन सब के स्वामी है -
जय जय हनुमंत संत हितकारी ,सुन लीजे प्रभु अरज़ हमारी 
अब विलम्ब केहि कारण स्वामी ,कृपा करहु उर  अन्तर्यामी 
जय-जय हनुमंत अगाधा ,दुःख पावत जन  केहि अपराधा 
अपने जन को तुरत उबारो ,  सुमिरत होय आनंद हमारो 
बल ,बुद्धि विद्या देहु मोहि ,हरहु कलेस विकार 
हनुमान जयंती पर विभिन्न पत्र -पत्रिकाओं में हनुमान जी से सम्बंधित विभिन्न लेख प्रकाशित होंगे। उन लेखों को पढ़कर कई बातें ऐसी होगी जो परस्पर विरोधाभास लिए होंगी ,यथा-उनकी उत्पत्ति को लेकर ..  ,पिता के नाम को लेकर  ...उनके जन्म स्थान को लेकर उनके देह त्याग और अमरता को लेकर  ...उनकी मुखाकृति को लेकर  ... ये ऐसी बातें है जो पाठक और भक्तों को दुविधा में डाल देती है कि आखिर सत्य क्या है ?कई ऐसी घटनायेँ उनके जीवन के साथ जुडी हुई है जो अविश्वसनीय और काल्पनिक जान पड़ती है।
      सामान्य वर्ग अपनी आस्था ,विश्वास और श्रध्दा के कारण बिना प्रमाण के भी यह स्वीकार कर लेता है कि  ऐसा हुआ होगा अथवा ऐसा ही है ,किन्तु स्वयं को बुध्दिजीवी और आधुनिकवादी तर्क देकर प्रमाणिकता की बात उठाते है। अपना पाण्डित्य प्रदर्शित करते हुए अपने अकाट्य तर्कों से दूसरों की आस्था और विश्वास को भी हिला कर रख  देते है।  धर्म ग्रंथों में वर्णित मान्यताओं और तथ्यों का खंडन करते है। विश्वास करनेवालों को अंध -विश्वासी ,रूढ़िवादी ,धर्मान्ध और  अल्पज्ञ जैसे  शब्दों से  सम्बोधित करते है।

       लेकिन तथाकथित बुध्दिजीवी और आधुनिकवादी यह क्यों भूल जाते है कि  धर्म और ईश्वर प्रमाणों पर नहीं  ,आस्था और विश्वास पर  टिके होते है। वैसे भी धर्म और ईश्वर को प्रमाणिकता की आवश्यकता नहीं होती ,धर्म और ईश्वर स्वानुभूत -स्वानुप्राणीत होते है। क्या सूर्य को यह प्रमाणित करने की आवश्यकता पड़ती है कि  मै ही जग को प्रकाशित करता हूँ ?नहीं न ,

Sunday, March 25, 2018

RAM NAVAMI -RAM JANM AVATAR


राम नवमी


राम नवमी -राम जन्मोत्सव 












राम नवमी ...या यूँ कहे  कि आज राम जन्म उत्सव है ...पौराणिक मान्यता के अनुसार  चैत्र मास की नवमी के दिन ही भगवान श्री राम का जन्म हुआ था।
युगों व्यतीत हो जाने के उपरांत भी भगवान श्री राम का जीवन चरित आज भी प्रासंगिक है ..प्रेरणा है ,उनके जीवन चरित .... उनके जीवन मूल्य अद्यतन ज्यों के त्यों बने हुए है। भगवान श्री राम  ,जो मर्यादा पुरषोत्तम कहलाते है ,जो स्वाभाव से सौम्य और शांत है ,उन्ही श्री राम ने अपने हाथों में धनुष -बाण धारण किये हुए है ,जो इस बात का प्रतीक है कि जब कोई हमारी मर्यादा को हमारी कायरता या कमज़ोरी समझे तो ,उसे हुँकार भरकर और हथियार उठाकर यह भी दिखला दे कि मर्यादा का पालन करने का अर्थ कायरता नहीं होती। जब सोने की बनी बालियाँ भी कान कटाने लगे , तो उसे भी उतार जाता है। इसी तरह आवश्यकता पड़ने पर हथियार उठाना हिंसा या निर्दयता नहीं बल्कि अत्याचार से मुक्त होने और होने देने का विकल्प है।

भगवान श्री राम को भगवानश्री विष्णु का अवतार  माने या  महापुरुष ? इस बात को लेकर अलग-अलग लोगों की अलग-अलग मान्यता है। पौराणिक मान्यता के अनुसार जब रावण अपने कठोर तप से प्राप्त शक्तियों का दुरुपयोग करने लगा था।  जब सभी देवता  ,ब्राह्मण  ,ऋषि  रावण के अत्याचार से त्रस्त  हो गए ,कुबेर अनुज वेदज्ञ होकर भी राक्षस हो गया  ,राक्षसी शक्तियां शक्तिशाली होकर धर्म का नाश करने लगी  ,यज्ञ नष्ट किये जाने लगे ,पूजा स्थल नष्ट किये जाने लगे ,ऋषि-मुनियों के तपोवन जलाये जाने लगे ,स्वयं इंद्र राक्षसों से पराजित हो गए ,तब समस्त ऋषि,मुनियों ने भगवान विष्णु से रक्षा की प्रार्थना की ,तो भगवान विष्णु ने नर रूप में भू- लोक पर अवतरित होकर पापियों को नष्ट करने का आश्वासन देकर अयोध्या में राजा दशरथ की भार्या कौशल्या के गर्भ से राम के रूप में जन्म लिया ,ऐसा माना जाता है।
वाल्मीकि रामायण में  भी इसका उल्लेख हुआ है ,पुत्रेष्टि यज्ञ के पश्चात् छह ऋतुएँ व्यतीत होने पर बारहवें मास चैत्र के शुक्ल पक्ष की नवमी को पुनर्वसु नक्षत्र और कर्क लग्न में कौसल्या माता ने राम को जन्म दिया।
इक्ष्वाकु वंश के राजा सगर  के पुत्र थे -रघु और रघु के पुत्र थे दशरथ। राजा दशरथ को वैभव पूर्ण  राज्य का सुख तो प्राप्त हुआ किन्तु वृध्दावस्था की दहलीज पर आ खड़े होने तक  ३-३ रानियां  होने के उपरांत भी संतान का सुख प्राप्त न था। संतानाभाव कि  चिंता और दुःख को उन्होंने अपने धर्म गुरु वसिष्ठ ,वामदेव ,जाबालि ,कात्यायन और गौतम के समक्ष प्रकट किया। तब गुरु वसिष्ठ ने संतान प्राप्ति हेतु तात्कालिक प्रकांड सिध्द , वेदज्ञ ,कर्मकांडी और तपस्वी ऋषि ऋष्य श्रृंग द्वारा पुत्रेष्टि यज्ञ करने का सुझाव दिया।
राजा दशरथ स्वयं अंगदेश गए और अपनी चिंता -व्  दुःख बतलाते हुए पुत्रेष्टि यज्ञ करने का आग्रह  किया ,जिसे  ऋष्य श्रृंग ने स्वीकार  कर लिया।

राजा दशरथ ने सरयू नदी के तट  पर भव्य यज्ञ का आयोजन किया ,वेद मन्त्रों के साथ शास्त्रोक्त अनुष्ठान प्रारम्भ हुआ ,यज्ञ आहुति के पश्चात् ऋष्य श्रृंग ऋषि ने राजा दशरथ को यज्ञावशेष चरु देते हुए कहा कि इस यज्ञ प्रसाद को ग्रहण करने के उपरांत सभी रानियां गर्भ धारण करेंगी। राजा दशरथ ने ने अंत:पुर पहुंचकर ऋष्य श्रृंग द्वारा प्रदत्त चारु में से आधा रानी कौशल्या को ,शेष आधे में से आधा कैकेयी को और शेष के दो भाग कर सुमित्रा को दे दिया।
यज्ञ का प्रयोजन फलीभूत हुआ। ऋष्य श्रृंग के कथनानुसार चैत्र मास  की शुक्ल  नवमी को राजा दशरथ के घर
भगवान श्री राम ने माता कौशल्या के गर्भ से जन्म लिया। इसीलिए चैत्र मास की शुक्ल पक्ष की नवमी को राम जन्म उत्सव के रूप में राम नवमी मनाई जाती है।

भगवान श्री राम ने सामाजिक ऐश्वर्य का त्याग कर सामाजिक मर्यादाओं का पालन करते हुए रावण जैसे आततायी का अंत कर समस्त प्राणियों और धर्म की रक्षा का दायित्व पूरा किया।